Thursday, April 22, 2021
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परमवीर होशियार सिंह दहिया

परमवीर होशियार सिंह दहिया का जन्म 5 मई 1936 को हरियाणा के सोनीपत जिले के सिसाना गांव के एक जाट जमींदार परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम चौधरी हीरा सिंह था। एवं माता का नाम श्रीमती माथुरी देवी था। जब वे 7वीं कक्षा में पढ़ रहे थे तब ही उनका विवाह श्रीमती धन्नो देवी से हो गया था।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही स्कूल में हुई थी उसके बाद उन्होंने जाट हायर सेकेंडरी स्कूल व जाट कॉलेज से आगे की पढ़ाई की।
वे वॉलीबॉल के बहुत अच्छे खिलाड़ी थे। आगे चलकर वे संयुक्त पंजाब की टीम के कैप्टन बने फिर देश की नेशनल टीम के भी कैप्टन रहे।

उनके गांव सिसाना में उस समय 250 फौजी थे उनसे प्रेरणा लेते हुए उन्होंने सेना में भर्ती होने का फैसला लिया।
1957 में उनकी सेना में 2, जाट रेजिमेंट में सिपाही के तौर पर भर्ती हुई। बाद में उन्होंने परीक्षा उत्तीर्ण करके प्रोमोशन पाया। और 30 जून 1963 को गर्नेडियर्स रेजिमेंट में ऑफिसर के रूप में कमीशन हुए। और नेफा यानी नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी में तैनाती हुई।

1965 के युद्ध में उन्होंने बीकानेर सेक्टर में अदम्य साहस का परिचय दिया जिसके लिए उन्हें मेंशन इन डिस्पैच का खिताब मिला।

1971 में एक बार फिर भारत और पाकिस्तान आमने सामने थे। उस समय शकरगढ़ सेक्टर की जरपाल चौकी पर पाकिस्तानी सेना का कब्जा था। यह चौकी सैन्य कारणों से युद्ध में बहुत महत्वपूर्ण थी। भारतीय सेना के काफी जवान वहां शहीद हो चुके थे। तब भेजर होशियार सिंह को 3 गर्नेडियर्स की अगुवाई सौंपी गई और उनके नेतृत्व में 250 सैनिकों को बसंतपुर नदी पर पुल बनाकर चौकी पर कब्जा करने का कार्य सौंपा गया।

वहां पाकिस्तानी सेना की संख्या 5000 के करीब थी। बारूदी सुरंगे बिछा रखी थी। लेकिन रत्ती भर भी परवाह न करते हुए वीर होशियार सिंह सैनिकों के साथ आगे बढ़ते रहे। रास्ते में उन्होंने पहले शहीद हुए अपने साथियों के शव देखे और वे विचलित हुए बिना और भी गुस्सेऔर जोश में भर गए। उन्हें पाकिस्तानी सेना के मशिनगन की गोलियों की बौछार भी सहन करनी पड़ी। जैसे तैसे वे आगे बढ़े और पकिस्तानियो पर भूखे शेर की तरह टूट पड़े। दुश्मनों प पीछे हटना पड़ा और भारतीय सेना ने चौकी पर तिरंगा लहरा दिया। पाकिस्तानी सेना ने बार बार चौकी हथियाने के लिए हमला किया। मेजर होशियार सिंह ने पीछे से टैंक मंगवाने के लिए संदेश भेजा तो उन्हें हालात को देखते हुए पीछे हटने का ऑर्डर मिला लेकिन मेजर साहब ने पीछे हटने से मना कर दिया और कहा कि ये तो चौकी है मैं तो इन पाकिस्तानियों को एक इंच जमीन भी न दु। रात के अंधेरे में हमला हुआ जिसमे मेजर साहब घायल हो गए। कहते हैं कि अंधेरा इतना ज्यादा हो गया कि किसी को ये भी न पता चल रहा था कि सामने दुश्मन का सैनिक ह या अपना। पूरी रात सबमें चुप चाप काटी। उजाला होते ही फिर से युद्ध शुरू हुआ। मशीनगन से मेजर व उनके सैनिकों ने पाकिस्तानियों के छक्के छुड़ा दिए लगभग 89 पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। यह सब देखकर पाकिस्तानी सेना अपने सैनिकों की लाशें छोड़कर भाग खड़ी हुई।
सीजफायर रुकने व युद्ध शांत होने के बाद ही मेजर ने ऊपर के आदेश माने। युद्ध समाप्ति के बाद उन्होंने पाकिस्तानियों को उनके सैनिकों की लाशें ले जाने की अनुमति दे दी।

इस तरह मात्र 250 भारतीय सैनिकों ने 5000 पाकिस्तानी सैनिकों की ईंट से ईंट बजा दी। कम्पनी का एक भी सैनिक शहीद न हुआ और 89 पाकिस्तानियों को ठोक दिया।
मेजर घायल होते हुए भी सैनिकों को हर नोरचे पर उत्साहित व निर्देशित करते रहे। स्वयं मशीनगन को संभाला। और घायल होने के बावजूद व ऊपर से आदेश आने के बाद भी उन्होंने चौकी न छोड़ी।
उनकी इस वीरता व अदम्य साहस के लिए उन्होंने परमवीर चक्र से समानित किया गया। मेजर साहब आगे भी सेना में अपनी सेवाएं देते रहे और अंत में ब्रिगेडियर के पद से रिटायर हुए।
6 दिसम्बर 1998 में खुशहाल जीवन बिताने के बाद उनका देहांत हो गया।

इस महान सपूत को कोटि कोटि प्रणाम।

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