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वीरता और स्वाभिमान का दूसरा नाम :  महाराणा प्रताप – Maharana Pratap

वीरता और स्वाभिमान का दूसरा नाम :  महाराणा प्रताप
[ 09 may 1540 – 19 January 1597 ]

तारीख 19 जनवरी यानी महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि। भारत के वीर पुत्र महाराणा प्रताप को भारत का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी भी कहा जाता है। सोलहवीं शताब्दी के राजपूत शासकों में से महाराणा प्रताप ऐसे शासक थे जो अकबर को लगातार टक्कर देते रहे। राणा प्रताप बचपन से ही वीर और साहसी ही थे। उनमें नेतृत्व करने की अद्भुत क्षमता थी। वे खेल खेल में अपने साथियों का नेतृत्व करने लग जाते थे। कम उम्र में ही उन्होंने तलवारबाजी, तीरंदाजी एवं घुड़सवारी जैसे रण कौशल सीख लिए थे। आइए जानते हैं उनसे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य:

    • महाराणा प्रताप का जन्म मेवाड़ में 9 मई 1540 को हुआ था।महाराणा प्रताप का पूरा नाम महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया था। महाराणा प्रताप का बचपन का नाम “कीका” था। इनके पिता का नाम राणा उदय सिंह था।
    • चेतक, महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा था। चेतक में संवेदनशीलता, वफ़ादारी और बहादुरी की भरमार थी। यह नील रंग का अफ़गानी अश्व था। वह हवा से बाते करता था। चेतक की बदौलत उन्होंने अनगिनत युद्ध जीते थे। हल्दी घाटी के युद्ध में चेतक काफी घायल हो गया था। लड़ाई के दौरान एक बड़ी नदी आ जाने से चेतक को लगभग 21 फिट की चौड़ाई को लांघना था। वह प्रताप की रक्षा के लिए उस दूरी को लांघ देता है लेकिन घायल होने के कारण कुछ दुरी के बाद अपने प्राण त्याग देता हैं। 21 जून 1576 को चेतक प्रताप का साथ छोड़ जाता है। चेतक की मृत्यु से प्रताप पहले जैसा नहीं रहता है।
    • महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा “श्री जैमल मेड़तिया जी” ने दी थी।
    • शत्रु के लिए भी रखते थे सदा एक तलवार अपने साथ : योद्धाओं के इतिहास में यह खूबी एकमात्र महाराणा प्रताप में थी। वे सदा अपनी दो तलवारों वाली विशेष म्यान में शत्रु के लिए भी एक तलवार रखते थे। उन्हें उनकी मां जयवंता बाई ने नसीहत दी थी कि कभी निहत्थे शत्रु पर वार मत करो। उसे अपनी अतिरिक्त तलवार दो और फिर ललकारो।
    • महाराणा प्रताप ने मुस्लिम योद्धा हकीम खां सूर पर पूरा भरोसा किया और वे हल्दीघाटी के मैदान में अग्रिम लड़ाकों में रहे। हकीम खां शूर पर उनका उतना ही यकीन था जितना लूणकरण, रामशाह, ताराचंद, राणा पूंजा आदि पर।
    • आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। महाराणा प्रताप के भाले का वजन 81 किलो था, जो एक ही बार में दुश्मन की जान ले लेता था।                          
    • महाराणा प्रताप ने मायरा की गुफा में घास की रोटी खाकर बहुत दिन गुजारे थे परन्तु अकबर की गुलामी स्वीकार नहीं की थी।
    • सम्राट अकबर ने 30  सालों तक महाराणा प्रताप को बंदी बनाने की कोशिश की परंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। महाराणा प्रताप की मृत्यु 29 जनवरी 1597 को हुई थी। शिकार करते समय वह दुर्घटनाग्रस्त हो गए थे।
    • हल्दी घाटी के युद्ध में करीब 20 हजार राजपूतों को साथ लेकर महाराणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80 हजार की सेना का सामना किया। इसमें अकबर ने अपने पुत्र सलीम (जहांगीर) को युद्ध के लिए भेजा था। जहांगीर को भी मुंह की खाना पड़ी और वह भी युद्ध का मैदान छोड़कर भाग गया। बाद में सलीम ने अपनी सेना को एकत्रित कर फिर से महाराणा प्रताप पर आक्रमण किया और इस बार भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में महाराणा प्रताप का प्रिय घोड़ा चेतक घायल हो गया था।
    • भामाशाह ने महाराणा के चरणों में अपनी समस्त संपत्ति रख दी। भामाशाह ने 20 लाख अशर्फियां और 25 लाख रुपए महाराणा को भेंट में प्रदान किए। महाराणा इस प्रचुर संपत्ति से पुन: सैन्य-संगठन में लग गए। इस अनुपम सहायता से प्रोत्साहित होकर महाराणा ने अपने सैन्य बल का पुनर्गठन किया तथा उनकी सेना में नवजीवन का संचार हुआ। महाराणा ने पुनः कुम्भलगढ़ पर अपना कब्जा स्थापित करते हुए शाही फौजों द्वारा स्थापित थानों और ठिकानों पर अपना आक्रमण जारी रखा।

“खबरदार इंडिया वालों! दिल्ली में भारत आ गया है।”

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